पंछी
By Simran Thakur
ऊँचे नील गगन में
उड़तें पंछी अपनी मौज में
पंख फ़ैलाए अपने दोनो,
झूम रहे हैं चारो कोनो।
एक डाल से दूसरी डाली
इस वृक्ष से उस वृक्ष
एक खंबा छोड़ दूसरा पकड़े,
तो कभी बैठे पंछी किसी के छज्जे।
खुले आकाश के प्राणी
रास आए इनको उड़ना
अपने पंखो पर भरोसा करके
ठान लेतें मीलो सफर पूरा करना।
प्यारे-प्यारे यह सभी पंछी
चाहते हैं बस खुलकर जीना
नहीं जरुरत इन्हे पिंजारो की
बिना बोले समझो इनका कहना।
नहीं रख सकते हम इन्हे पिंजर में
अच्छे लगते है पंछी नीले अंबर में
उड़ान भरते जब ऊँचाइयो में,
चार-चाँद से लगते खाली वातवरण में।
नहीं चाहिए इन्हे कोई सहारा
खुद मेहनत से बनाते हैं,
जोड़-जोड़ कण अपना घोसला।
टहनियो को एकत्रित कर पेड़ो पर ले जातें,
नन्हे पंछी कितना कुछ है सिखाते।
बहुत सुंदर-सी प्रजाति,
है अनेको रूप, अनेको आकार।
छुकर बदलो को अनंत बार,
आतें धरा पर करने आहार।
चह-चहाहट से बढ़े रौनक,
लगता है संगीतमय संसार।
कई रंगो के पंछी
नीला, काला, हरा, या कहू मोर सतरंगी
देखकर इन्हे हृदय आनंदित हो उठा,
फुर्सत में की ईश्वर ने यह संरचना।
बैठे हर बार अलग प्रजाति मेरी छत पर,
कभी मैना, तो कभी मत्स्य रानी किंगफिशर।
और भी न जाने कितनी हो तुम,
पर हर एक पक्षी में है अपने भिन्न गुण।
इतने प्यारे हो तुम सारें
नज़र न लगे परो को तुम्हारे
ऐसे ही बढ़ाओ आकाश की शान
कभी न रोक सके तुम्हें कोई तूफान।
सुखमय है इन जीवो को देखना
सिखलाते हैं खुद पर भरोसा रखना
स्वर्णिम पक्षी हो तुम भूमि के,
बटोरकर तिनका-तिनका बनाते आश्रय।
जीव हो तुम निडर, आत्मनिर्भर, प्यारा,
एक उड़ान में नाप लेते,
अनमोल ऊपरी सामराज्य सारा।
छुकर क्षितिज वापीस आतें,
संध्या समय में पंछी घोंसलो में आराम फरमाते।
By Simran Thakur

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