नारी
By PRATEEK SAINI
दुनिया के चुनिंदा अलफाज़ों से बयान करता हूं
चलो आज उसके बेमतलब से कामों पे बात करता हूं
सुने होंगे बेशक तुमने ये नगमे नुक्कड़ मोहल्लों में
मैं फिर भी याद दिलाने की कोशिश इस बार करता हूं
क्यों दिन कोई भी याद नहीं जब वो गहरी सी सोई थी
कब चाक चूल्हे से हल्की हुई कब फिर बर्तन में खोई थी
लगता है रोज़ वो नपी तुली सी ही हंसी हंसती होगी
लाज के परदों को हर रात समेट कर रखती होगी
ज़िंदगी उलझी है पर घर को सुलझा लेती है
वो हर रोज़ दिल को बहला बुझा लेती है
हां गुस्सा है कभी कभी गमगीन हो जाती है
मायके की चिठ्ठी से झट रंगीन हो जाती है
बचत की पूंजी में सपनों को समझा लेती है
इतनी खोई है रिश्तों में के खुद को उलझा लेती है
झगड़ती है कभी पर हर बार गलत बन जाती है
खुद सही हो बेशक पर घर को ही सही बताती है
हम चश्मदीद हैं पर शायद देखना नहीं चाहते
उनके त्याग को ठीक से समझना नहीं चाहते
तुम मानो ना मानो वो फिर भी निभाऐगी
मां है पत्नी है बेटी है वो हार कर भी जीत जाऐगी
By PRATEEK SAINI

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