तलाश
By Agrima Bajpai
मद्धम मद्धम से गिर रही थी बूंदे,
उसने कहा आ चल उसे ढूंढें,
जो रिमझिम रिमझिम पर लहरा रही होती,
बांहे फैलाकर गुनगुना रही होती,
जो फूलों को कुछ राज़ बताती,
और तितली को अपने हाथ पर बैठाती,
जो सौंधी मिट्टी से लिपट जाती,
फिर मईया की डांट भी खाती,
जो नौका को पानी में बहाती,
बेजान में जान फूंक के उछल जाती।
पर तालाश बड़ी ये है लंबी,
क्योंकि खो गई है वो कही,
हसी में उसकी अब खुशी नहीं झलकती,
मानो भूल गई है वो, कभी थी वो चहकती।
By Agrima Bajpai

Stupendo Fantabulously Phantasmagorically Magical 💖💖
Great poem!⭐👏
Excellent 👌
It's just amazing
Nice