तनाई....
By Anita Sharma
तनाई का आलम मत पूछो,
हर तरफ हैरेत के मैदान....
पसरा रहता हैसनाटा ऐसा
जैसेग लि यां पुरानी हो सुनसान...
भूली-भटकी याद तेरी गुज़रती हैकभी तो थोड़ा कसमसाता हैयह वीरान... नजर दूर तक ढूंढनेजाती है
मगर लौट आती हैझुकी सी नादान...
कोई शि कायत भी कि स सेकरे
सूनी झाड़ीयां, सूनेमकान...
इका-दुका कोई दि ख भी जायेतो सब लोग यहाँपर हैअनजान...
न हलचल कोई न बोलचाल कि सी से न खुलेदरवाजे,न झाँकता कोइ रौशनदान... झरोखेभी ठुसेपडे़ हैघौनलो से
खि ड कि यां भी चरमराती बेजान...
कही दूर सि गड़ी का उठता धुआँ
फै ला देता हैतेज़ गन हवा मे
बस यही हैयादगार यहाँकी
यही हैयहां िजंदगी की पहचान....
तनाई का आलम मत पूछो
हर तरफ हैरेत के मैदान...
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By Anita Sharma

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