जवान
By Jagrati Chaurasiya
माँ के आंचल की महक लिए,
जो पिता के नाम को रोशन करे।
बहिन की राखी को जो,
बस खत के साथ निहार ले।
भाई का जो अभिमान बने।
पत्नी जिसका हौंसला रहे।
इन सबसे प्रेरित हो,
तो कोई "जवान" बने।
धूप की तीखी वार सहे।
कभी सर्द बर्फ का आघात लगे।
बारिश में जो डटा रहे।
दुश्मन भी उसका क्या बिगाड़ सके।
हर पल चौकन्ना,कान खड़े।
उसे क्या अंतर कब
सूर्य उगे,कब सांझ ढले।
खाने का जब कुछ समय मिले।
उस वक्त ही तो वो खुद से मिले।
ऐसा त्याग समर्पण कहाँ,
बिना स्वार्थ सर्वस्व का अर्पण कहाँ।
वो अपना सब कुछ भारत माँ को मान चुका।
अपना जीवन भी माँ के चरणों में वार चुका।
ज़िक्र नहीं परिवार का पर,
फ़िक्र तो मन को झकझोंर चुकी।
अगर शहीद वो हो गया तो,
क्यों आँख तुम्हारी नम नहीं।
भारत माँ का लाल था वो,
क्या खलती उसकी कमी नहीं।
वो फख़्र से तिरंगे में लिपट गया,
क्या तुमको उस पर नाज नहीं।
जिस घर का बेटा था,
बस एक शहीद बन गया,
अब वो बेटा रहा नहीं।
By Jagrati Chaurasiya

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