छोरी
By Pragati ishwarchand sahuji
ए छोरी चल उठ अपना बदन झाकले
इसे ढकने कोई नही आएगा
हा पर ये याद रख, जब खोलना हो इसे तो हैवान का हाथ नही थर थरायेगा
छोरी है तू जरा सम्भल के चलना
ना लटक के चलना ना मटक के चलना
किसिना किसिके नजर मे तेरा ये बदन आएगा
हा पर ये याद रख, जब खोलना हो इसे तो हैवान का हाथ नही थर थरायेगा
तू पढ़ती है तो जरा आराम से पढना
हस्ते समय ज्यादा ना इतराना
बालो के लटो को जरा पीछे से लगाना
ये समाज तेरी आझदि पे बेडियाँ लगवायेगा
हा पर ये याद रख, जब खोलना हो इसे तो हैवान का हाथ नही थर थरायेगा
तू जाना आचल ढक कर तेरा
दुनिया से नजरे मिलाना तू
आदर्श वादी संस्कारी बन के रहना
खुदकि रक्षा करना ना जानवरोसे डरना तू
तू कितना भी ढक ले खुदको
फिरभी नोचा तुझको ही जायेगा
तूछोरीहैतूझेखोलनेमेहैवानौकाहाथनहीथरथरयेगा
By Pragati ishwarchand sahuji

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