चाहत
By Vikas Kumar
एक बंद किताब सी हो तुम, तुम्हे ताउम्र पढ़ना चाहूं।
तेरे नयनों से उमड़ती ये वेदना, इन्हें ताउम्र बांटना चाहूं।
इन दर्दों को जड़ से मिटा सकूं, ऐसी दवा मैं बनना चाहूं।
तुझे खुशियों की सौगातें दूं, तेरा हमनवा मैं बनना चाहूं।
तालाब के तरह शांत हो तुम, नदियों सा मैं हलचल चाहूं।
कब तक रहें हम अजनबी, जब मैं तुमको हर पल चाहूं।
मेरे सारे अल्फाज़ तुम्हारे, मेरी पूरी किताब तुम्हारी।
ख्वाबों से इतर भी कभी, तेरी अमानत तुम्हे सुनाना चाहूं।
गर हो तेरी इजाजत तो करूं तुमसे एक छोटा सा इसरार।
मुझे इजाजत दो ना कब से करना चाहूं इश्क का इज़हार।
तेरे इस हसीन किताब का मैं कतरा कतरा पढ़ना चाहूं।
तुम थाम लो मेरे हाथों को मैं भी बस अब संभलना चाहूं।
तेरा दामन थाम के मैं कब से ये गीत सृजन का गाना चाहूं।
खुद को तुझपे यूं वार के मैं पन्ने दर पन्ने बस तुझे जीना चाहूं।
By Vikas Kumar

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