“चांद”
By Renu singh
बादलो से खेलता आंख मिचौली,
सफर में संग संग चलता नजर आए,,,
वो चांद तो है बहुरूपिया,
कभी पूरा तो कभी आधा नजर आए।
दिवानगी में शामिल जो हुए हम, उससे लगा बैठे प्रीत,
जब आस हो दीदार की
वो बोझिल हो जाए।
बात अमावस की हो तो दिल को तसल्ली दिया जाए......
यहा तो बात चांदनी की है
कैसे मन को समझाए।
काली रात के आंचल मे आकर, जब चांदनी छा जाए बलखाकर...
दूर बैठा जो महबूब बनकर वो चांद... कोसो दूर नींद ले जाए ।।
पर बात कुछ यूं भी है कि
....पलके मूंद के देखिए खुद ब खुद नींद आ जाएगी..
चांद भी मदहोश है चांदनी के सामने,
फिर हमसे बचके मदहोशी कहा जाएगी।।
By Renu singh

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