चरखी
By Pragati Dandriyal
एक शाम, मेले में चरखी की सैर के दौरान मेरे मन में कई विचारों ने दस्तक दी।
चरखी की चाल,
कभी उतराव, तो कभी चढ़ाव
मानो जीवन का जैसे कोई सार हो
सार बता रहा जैसे कोई विचार हो
विचार ऐसा जो सबको स्वीकार हो
स्वीकार सत्य ये अनोखा हर बार हो
हर बार हर फेर दोहराता जैसे यही एक सार हो
नीचे होने पर ऊँचाइयाँ लुभा रही थी
और शिखर पर धरती बुला रही थी
पर हर मोड़ एक नई दास्ताँ सुना रहा था
मन मेरा भी कुछ नयी धुन गुनगुना रहा था
चरखी चलती गई
साथ, मैं भी बढ़ती गई
बुलंदियों की चाहत
और जड़ों से जुड़ाव की राहत
लिए सब, चरखी चलती गई,
चरखी चलती गई!
By Pragati Dandriyal

beautifully symbolic
Nice🙌
Nice🙌
बहुत खूब ♥️
🌸😍