गुरु
By R.Devika
सिर्फ तीन साल की थी मैं, जब माँ ने मुझे पहली बार विद्यालय छोड़ा
नई जगह, अनजान चेहरे, सहमी सी थी मैं, डर भी था थोड़ा-थोड़ा,
तभी सामने से मुस्कुराती हुई एक महिला आई
प्यार से मेरी बाँहें थामी और कहा, "चलो थोड़ी देर के लिए ले हम माँ से विदाई",
फिर मेरे हाथों में एक छोटी सी गुड़िया पकड़ाकर बोली,
"तुम्हारी जैसी और भी गुड़ियाएं हैं अंदर, देखोगी?"
मैं मन ही मन खुश हुई, कहा, "ज़रूर, क्या सचमुच आप दिखाएंगी?"
जवाब मिला, "हाँ, तुम्हें आज से मैं एक अदभुत लोक की सैर कराऊँगी,
जहाँ खेल ही खेल में तुम्हें दुनिया को जीतने का जादू सिखाऊँगी",
उस समय, ज्यादा तो कुछ न समझ पाई मैं,
उनका हाथ पकड़ा और बढ़ाया आगे कदम,
पर जिस नज़ाकत से उन्होंने एक बच्ची का दिल जीता,
क्या थी वो कोई जादूगर से कम?
प्रथम गुरु थी वो मेरी, बिंदुओं को जोड़कर उन्होंने मुझे सिर्फ अक्षर लिखना नहीं,
जीवन जीने की दी तैयारी,
सौभाग्य है मेरा कि आगे चलकर मैंने ऐसे कई गुरुजनों का आशीर्वाद प्राप्त किया,
जिन्होंने मुझे सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि एक व्यक्ति से इंसान बनना सिखाया,
किसी ने गणित सिखाकर खुशियों को दुगना और परेशानियों को घटाना सिखाया,
तो किसी ने इतिहास सिखाकर अपने देश पर गर्व करना,
किसी ने विज्ञान का ज्ञान दिया,
तो किसी ने भाषा सिखाकर अपनी विचारधारा को स्पष्ट करना,
किसी ने खेल-कूद से सेहत बनाना,
तो किसी ने नृत्य और गान से जीवन का लय और ताल समझना,
पर क्या हम अपनी भाग-दौड़ में अक्सर यह नहीं भूल जाते कि,
कभी इनका भी मन करता होगा, अलार्म बंद कर थोड़ी देर और सो जाने का,
कभी छुट्टी लेकर अपने बूढ़े माँ-बाप के संग कुछ समय बिताने का,
कभी अपने बच्चों का मनपसंद गरमागरम खाना बनाकर उनके स्कूल से आने का राह ताकने का,
या कभी दोस्तों के साथ, एक बार फिर बचपन में लौट जाने का!
पर तब याद आती होंगी अपनी ज़िम्मेदारियाँ अनेक
महामारी को भी हराकर, निष्ठा से निभाते गए अपने कर्तव्य हर एक,
आज मेरा शीर्ष उन सभी गुरुजनों के सामने झुकता है,
जिनकी दी गई सीख के बलबूते यह संसार चलता है।
'आचार्य देवो भव' कहा जाता है
क्योंकि उनमें तो साक्षात् भगवान बसता है।
By R.Devika

Good poem
Awsome
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