गाँव
By Kushagra Singh
गीली बारिश की बूंदे जब मिट्टी की मांग सजाती है
या मिट्टी की मलयवादी सुगंध जब मन को साध जाती है
गाँव की मिट्टी मे सजी तुलसी जाने क्यों नहीं मुरझाती है
क्या मेरी तरह उसको भी चंदा की याद सताती है
ये वही मिट्टी है जो अपनों का ऐहसास कराती है
ले चलो मुझे गाँव की ओर
के मेरी मिट्टी मुझे बुलाती है
जब मैं मिट्टी के मकान से पक्के मकान मे चला गया
लौटकर मिलना है उसी मिट्टी मे
ये जानकर भी नजाने किस गुमान मे चला गया
वो भी एक ज़माना था जब मिट्टी के कंगन हुआ करते थे
मिट्टी के चूल्हे मिट्टी के बर्तन और मिट्टी के आँगन हुआ करते थे
मिट्टी से जुड़े मन ने मिट्टी से बने तन ने
नजाने समय को कैसा पलटा
के यही मलयवादी मिट्टी सभी आखों मे शूल बन गई
किसी गाँव की मिट्टी, शहर मे आ कर धूल बन गई।
By Kushagra Singh

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