कर्ज़
By Sonali Kar
एक ओस भरी सुबह,
मालिक के असमझ व्यवहार से क्षुब्ध माली
अपने समेटे हुए बग़ीचे में लौटा—
गुस्से से भरा, हृदय में चोट लिए।
कहा उसने—
"जिन फूलों की आभा पर घमंड करता है मालिक,
वो मेरी ही मेहनत का पसीना हैं!"
और एक-एक टहनी को खींचते हुए
फूलों को तोड़ा,
उन्हें पैरों तले रौंद डाला।
आज माली का स्पर्श कठोर था,
लेकिन फूलों ने ना विरोध किया,
ना हिचकिचाए—
क्योंकि वे जानते थे
कि इन्हीं हाथों ने कभी उन्हें
आसमान में उड़ने का ख्वाब दिया था,
तितलियों के परों में रंग भरना सिखाया था।
वो पंखुड़ियाँ—लाल, गुलाबी, पीली—
एक-एक कर टूटती रहीं,
और माली…
उन्हें उन पत्तों पर बिखेरता गया
जिनकी गोद में
कभी बड़े नाज़ों से उन्हें पाला था।
जब क्रोध की आग बुझी,
थक कर बैठ गया वह
एक छोटे से वृक्ष की छाया में।
हवा ने टहनियों को छुआ,
और उसकी शीतल छाया
माली के भीतर के तूफ़ान को शांत करने लगी।
तभी,
माली की हथेली पर
एक गुलाबी पंखुड़ी आ गिरी।
शब्द मौन थे…
पर हृदय चीख उठा।
उसके बग़ीचे ने
उसे कभी निःस्वार्थ प्रेम किया था।
माली के लिए बग़ीचा उसकी रचना थी,
उसकी कमाई का केवल एक ज़रिया।
और बग़ीचे ने ना माली के अलावा किसी को जाना था।
By Sonali Kar

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