उलझन…
By Pragati Dandriyal
बंजारे से फिर रहे हैं हम
उठकर बेशुमार गिर रहे हैं हम
सुलझा सा रास्ता उलझ क्यों रहा है?
उलझन में फिर हर बार घिर रहे हैं हम!
मंजिल वाकिफ़ होते हुए भी अंजान है
लंबा सफर, कंधों पर बोझ, दिल में कई अरमान हैं
हर एक चूक का महँगा जु़र्माना है ,
महँगाई में एक नया ख़र्च रोज़ गिन रहे हैं हम!
By Pragati Dandriyal

Simple, honest, and deeply relatable
Nice🙌
💓✨
Well written 👏
Lovely