उलझन
By Vijay Kumar Nagar
कुछ अनकही-सी बातों में उलझ रहा है मन
भावना सागर की लहरों में तैरता चल रहा है मन.
चलते चलते कुछ देर रुकना
रुक रुक कर फिर चल पड़ना
लिए गए निर्णय अपने पर.
पुनर्विचार करते चल रहा मन.
अनिश्चय घनघोर तिमिर और असमंजस के सागर में
डूबता उतरता मुड़-मुड़ के देखते चल रहा है मन.
सागर. धरती. उन्नति. अवनति. कामना. आकांक्षा
सब की है कोई न कोई क्षितिज.
इस क्षितिज का अंत कहीं. किसी ओर नहीं है मन
कभी विचार शून्य. कभी समेटे सारा ब्रह्मांड है मन.
कभी खग-सा उड़ता. चंचल है नभ में मन
वैचारिक भीड़ से घिरा हुआ. फिर भी तन्हा है मन.
सीमा तोड़ अवकाश की. पार जाने को आतुर है मन
वर्जना समस्त लांघ समाज की आज कुछ.
व्यथा कथा कह कर. हल्का होने को है मन.
भावना की बहती सरिता व्यग्र है
मिलने किसी निर्णय के सागर को
अव्यक्त से मिलकर मिट जाने को करता है मन.
सपने देखें मैंने मनोहर. मनोरंजक ना जाने कितने
सुप्त जागृत आँखों से सुख और दुख के.
कभी रोता बिलखता. सुहानी याद पर मुस्कराता है मन
अमावस्या निशा में. शय्या निश्चल पर पड़े-पड़े मन.
गिनने सलवटें अवचेतन चादर की. प्रयत्न करता है मन
डरता है प्रवेश को. अंधेरी सूनी अगोचर घाटी में चेतन मन.
परिणाम हुआ क्या उन स्वप्नों. का जो स्मरण रहे
कुछ को विस्मृत करने को. किस ने विवश किया मन.
शेष छल कर गए. पारिवारिक उत्तरदायित्व की ओट में.
बाकी कुछ उत्सर्ग हुए, वास्तविकता के समरांगण में
देख स्वप्न के समापन को , व्यथा कथा कर याद
आँसू पोंछा करता है एकांत में अब भी मन
कर सीने में समस्त दारुण परिणाम दफन
बीत रहा है जीवन अब मरुस्थल के शुष्क तरु वर सा
बाल सुलभ आशा से अब भी भरा हुआ है मन
दृष्टि गोचर हो कहीं कोई शेष दूरी का पथ्थर
दिल की उलझनों को कागज़ नहीं उतार पा रहा है मन
थक हार कर रब को सब समर्पित करता जा रहा हैं मन
निकल आए कोई किसी मरुधरा के टीले के पीछे से
सहचर कोई परम प्राण सा, क्षर की सीमा से ऊपर
भुवन मोहिनी मुस्कान लिए वो धरे हाथ कंधे पर
चले साथ मेरे अनंत को पूर्ण शांत होकर मन ।
By Vijay Kumar Nagar

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