उम्र
By Shivangi Kaushik
हर साल उम्र एक पड़ाव और पार कर जाती है ।
हर जन्मदिन पर आकर दरवाजा खटखटाती है,
अक्सर याद दिलाती है कि उठ जाइए जनाब समय नजदीक है।
इस समय की नजदीकी का एहसास कभी खुद की , कभी अपनों की, कभी साथी की, कभी खुशियों की, कभी दुखो की, कभी लम्हों की, कभी सफर की, कभी परिवेश की, कभी ख़लक की, कभी जिंदगी की, इस जहां के हर एक तिनके की छुटती ट्रेन की ओर इशारा करता है।
कहती है कि साहब समय खत्म होने को है,
ट्रेन का आखिरी स्टेशन नजदीक है।
By Shivangi Kaushik

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