Wish
Updated: Sep 21, 2022
By Shivvir Singh Bhadauria
देख गगन में चाँद और तारे
देख नदी और देख किनारे
दूरी ही है नियति इनकी
कुछ रिश्ते दूरी के मारे
बस सपना है साथ तुम्हारा
पुलकित मन में है उजियारा
संग चलेंगे जीवन पथ पे
बीच धार या मिले किनारा
खो बैठा हूँ मैं तो सुध बुध
तुम बस मेरे अपने हो
प्रेम के नंदन कानन में
इठलाते मृग छौने हो
अब जब हमको मिल ही गए
तो आओ बैठो पास मेरे
कुछ खुशियां हम तुमको दे दें
कुछ गम बांटे साथ तेरे
करतीं बक बक मैं सर धुनता
तुम ये कहतीं मैं वो सुनता
भरता आलिंगन में तुमको
चुम्बन अधरों पे धरता
वो हाथ गाल पे प्यार भरा
वो हाथ जो मेरे हाथों में
उस कंधे पर जब सर रखता
फिर नींद कहाँ इन आंखों में
सब वो अतीत अनजाना सा
क्यों बचपन में तुम मिले नहीं
किशोर वय के पल अनमोल
क्यों साथ मेरे तुम फिरे नहीं
वो तरुणाई और यौवन वो
क्यों मेरा हिस्सा बने नहीं
थे मेरे ही जब सदियों से
क्यों पहले मुझको मिले नहीं
जो रहा बचा इस जीवन में
लगता वो कितना सुंदर है
सूना अतीत जो गया बीत
जो हर्ष हृदय के अंदर है
अब रहना मेरे साथ सदा
तुम छोड़ न जाना हाथ मेरा
इस बार नहीं उस बार सही
तुम देना फिर से साथ मेरा
By Shivvir Singh Bhadauria

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