Poem
By Prakhar Pare
यूं तो तिनके में ही रख दो मुझे या ताज पर सजाओ मुझे मगर न रखो इन सस्ती नुमाइशों में मुझे
यूं तो एक घुट भी न दो मुझे या सिर्फ मेहखाना ही पिला दो मुझे, मगर ना पिला ए साकी पैमानों के कतरों में मुझे
यूं तो मुर्दों में ही रख दो मुझे या जिंदा ही कर दो मुझे मगर ना रखो इन अंधी, बहरी, गूंगी, अवामो में मुझे
यूं तो एक उम्र भी न दो मुझे या सिर्फ जीना ही दो मुझे मगर जो दे सको तो साथ उसके सिर्फ एक पल ही दे दो मुझे
के ज़ख्म कोई कोई कुरेद नही रहा है
जा के कोई कहे उसे ज़ख्म पर नया मरहम ए ज़ख्म ही दे दे मुझे
और जो इतना भी न दे सके ऐ खुद तो पैमाने में जहर ही दे दे मुझे
By Prakhar Pare

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