हूर
By Dr. Imran A.K. Surti
तेरी जुल्फें जो उड़ती हैं,
तो मेरा दिल मचलता है,
कहीं कलियाँ सी खिलती हैं,
कहीं गुलशन महकता है,
जो तू निकले घरोंदे से, तो सूरज भी निकलता है,
जो तू हस दे तो ये बादल, भी बिन बादल बरसता है!
जहाँ तुम हो वहां में हूँ
नहीं अब कोई अंतर है,
मोहब्बत की दुनिया में,
नहीं हमसा कलंदर है,
झुलसती रेत सा ये इश्क है सुनलो मेरे यारो,
अभी ये तो बवंडर था, अभी ये तो समंदर है!
ओमर की है रुबाई या,
ग़ालिब की ग़ज़ल है तू,
कभी बहता हुआ चश्मा,
या गाँव की फसल है तू,
तेरी अंगड़ाई को ही देखने तो चाँद निकलता है,
कभी ये तो मचलता है, कभी ये तो संभलता है!
By Dr. Imran A.K. Surti

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