सफ़र
By Shivangi Kaushik
कल चिड़ियां फिर उड़ जाएगी अपने घोंसलों की तरफ़,
अपने घरों को छोड़ हौसलों की तरफ़ ।
अब कहा घर पर पहले के जैसे रहना होता है,
कुछ दिन की मेहमान नवाजी बस फिर वापस उड़ जाना होता है ।
कहा आसान होता है सफर मंजिल को छूने का,
हर मोड पर बहुत कुछ पीछे छोड़ जाना होता है।
अब कहा घर पर पहले के जैसे रहना होता है,
कुछ दिन की मेहमान नवाजी बस फिर वापस उड़ जाना होता है ।
अब कहा दोस्तों से वैसा याराना होता है,
सब छूट जाते है पीछे है अब कहा वैसे मिलना होता है ।
सफर पर निकला मुसाफिर फिर कहा हमेशा के लिए घर लौट पाता है,
आता है जाता है बस फिर गुमसा हो जाता है,
रहता तो है कईयों के दिल में पर बहुतों के जेहन में धुंधला भी पड़ जाता है।
अब कहा घर पर पहले के जैसे रहना होता है,
कुछ दिन की मेहमान नवाजी बस फिर वापस उड़ जाना होता है ।
By Shivangi Kaushik

❤️🌸
Beautifully written poem 😍