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“समय “

May 25, 2024
2 min read

Updated: Jul 29, 2025

By Rashmi Dadhich



समय व नारी का संवाद 


क्या फर्क पड़ता है कि तुम एक बेटी हो?? 

 बंधनों में, दायरों में, दहलीज में, 

क्यों खुद को समेटी हो???? 

फिर क्या फर्क पड़ता है तुम एक बेटी हो??? 


माना, तुम्हें मारने की, दबाने की,

 जलाने की, कोशिश की है, 

हां एक नहीं कई सदियों ने मिलकर, 

 यह साजिश की है।

 पर तुम भी तो बड़ी ढीट हो, 

हर सदी के पत्थरों पर रत्न बनकर जड़ी हो। 

अंधेरों में रोशनी सी मशाल बनकर खड़ी हो, 

तुम अटल इरादों सी चट्टान बनकर अड़ी हो, 

अरे गर्व करो खुद पर, 

तुम कीचड़ में कमल बनकर खड़ी हो। 

फिर क्या फर्क पड़ता है….. 


हां समाज में तुम्हें बराबर नहीं, 

थोड़ा कम समझते हैं। 

तुम पर गालियां, मजाक, चुटकुले, बना, 

ठहाके मार कर हंसते हैं। 

पर तुम कब किसी से हारी हो??? 

अब तुम कहां बेचारी हो??? 

बंजर जमीन पर तुमने ही, 

कड़ी मेहनत से फसल लगाई है। 

ये तुम्हारा ही असर है कि, 

परिवर्तन की लहर देश में आई है। 

फिर क्या फर्क पड़ता है, लोग तुम्हें क्या समझते हैं?? 

 वे तुम पर नहीं अपनी असफलता पर हंसते हैं। 



                 “नारी “

सच, मैं चुप रह कर सहती हूं, बस यही कहती हूं, जाने दो, क्या फर्क पड़ता है??? 

पर कुछ है जो सदियों से, हर पल, हर घड़ी, मुझे भीतर ही भीतर अखरता है… 

आदमी, जिसे मैंने ही जना है.. 

मेरा मन, मेरी आत्मा, मेरे लहू में ही सना है। 

फर्क पड़ता है…..

 जब वही मेरे आंचल को रौंदकर, 

सरेआम तार-तार करता है… 

मुझे उंगली दिखा कर, 

मेरे किरदार को ज़ार- ज़ार करता है… 

वो दूध जिसे पीकर उसे बल मिला, 

उसी बल से मुझे गिरा कर, मुझ पर वार करता है। 

फर्क पड़ता है…..


जिस नारी ने उसे स्वतंत्र अस्तित्व दिया 

उसे ही अपनी महत्वाकांक्षाओं में कैद कर उसकी आत्मा पर प्रहार करता है…

जिस देह से उसे अस्तित्व मिला, 

उसी देह का खुलकर व्यापार करता है… 

फर्क पड़ता है…. 

जब कोई दरिंदा कहीं सर उठाता है,

 यह कोख मुझसे पूछती है यह अक्स किसका नजर आता है??? 

 कहीं कोई कमी तो नहीं तेरे संस्कारों में???? 

जो औरत की देह से निकला आदमी औरत पर ही कहर ढाता है????

औरत की देह से निकला आदमी औरत पर ही कहर ढाता है????


By Rashmi Dadhich




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