शिव
By Sushant Saurabh
जब शांत बैठा संत हो,
अनंत का भी अंत है।
प्रखंड का भी खंड हो,
स्वरुप फिर भी अखंड है।
समर कितना ही प्रखर,
अजर है, अमर है।
धर्म जिसका कर्म हो,
अघर्म उसका मर्म है।
प्रारब्ध जिसका बुद्ध हो,
अशुद्ध भी विशुद्ध है।
जिसमे बसता शिव हो,
निर्जीव भी सजीव है।
By Sushant Saurabh

Comments