शिव
By Akanksha Tiwari
हाथ लेके बैठा कमंडल
माथे पे तीन लोको की माया है
मेरे शिव ने ऐसा तिलक तो भस्म से लगाया है
जो त्याग हर पहनावे को
वैरागी रूप मे आया है
ऐसे मेरे शिव ने जटाओ के बीच तो गंगा को अपनाया है
जो महाकाल कहलाकर
भोला भी कहलाया है
ऐसे मेरे शिव ने ना जाने कितना नामो को अपनाया है
जिसके अंत मे आरंभ है
आरंभ मे नया अंत
ऐसे मेरे शिव के रूप है प्रचंड
जो तीनो लोको का स्वामी है
पर अघोरी अंतर्यामी है
ऐसे मेरे शिव, देवों के भी स्वामी है
जो अस्तितव का ज्ञान कराए
नये अस्तितव को संसार मे लाए
ऐसे मेरे शिव ने किये है ना जाने कितने ही सिर्जन
डम-डम जिसका डमरू बोले
जो नंदी का स्वामी है
है जो चर अचर मे विराजमान
जिसके ताण्डव से छा जाए हाहाकार
ॐ जिसका हरी ॐ भी कहलाये है
हो जिसने राम के सत्य को अपनाया
जिसके बाद बिना आत्मा के मैं शव ही कहलाया
है वो मेरे शिव जिनके अस्तित्व मे मैं समाया
है वो मेरे स्वामी हर हर महादेव अंतर्यामी
By Akanksha Tiwari

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