याद
Updated: Sep 20, 2022
By Harshit Negi
वक्त से ऊपर उठकर.
अपने हौसलों को एक हथियार बनाकर
आज मैं चल पड़ा हूं इन निशानों के पीछे
जो छोड़ गया है कोई लहू से सनकर।
याद नहीं बस एक परछाई है
एक आकृति है जो मन में समाई है.
उन्हीं आंखों के लाल रंग को देख, जिनमें जीवन की नफरत समाई है।
कभी उस हथियार को देखता, उस की चमक से आँखें छुपाता
हर पल इसी ख्याल में कि कहीं इसी चमक के साथ ही बंद न हो जाये आंखें मेरी
और मैं भी खो जाऊं उस अंधेरे में।
कुछ लोग पता नहीं कैसे हर रंग में रंग जाते हैं.
कहते हैं बेरंग खुद को और हर रंग दिखा जाते हैं।
अरे बेरंग होने का मतलब भी पता है उन्हें ?
कुछ रंगों को मिटाने में हम खुद बेरंग हो जाते हैं।
By Harshit Negi

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