माँ
Updated: Jul 30, 2025
By Sohani Parmar
धुप से निकलती छाँव सी हो तुम,
किसी घाँव पर लगे मरहम सी हो तुम,
डांटती हो तो अंगार सी हो तुम
पर जब मान जाती हो तो मोम सी हो तुम,
अपनी मुस्कुराहट से घर को बाँध कर
रखती हो तुम, सुबह के पांच बजे हो या
रात के बारह, अपने परिवार के लिए वक़्त
कहाँ देखती हो तुम, जभी आवाज लगाओ
सामने आ जाती हो तुम, लाखो रिश्ते होंगे
इस दुनियाँ मे पर कहाँ ऐसा निस्वार्थ प्रेम
है, जन्नते तो आज भी माँ सिर्फ तेरी गौद
मे है।
By Sohani Parmar

Comments