माँ
Updated: Jul 30, 2025
By Chandra Kant Mishra
मेरी हँसी, मुस्कान तुम्हारी मेरे दुख में तू रो देती, धूप पड़े जो सिर पर मेरे झट ममता का आँचल रख देती। जब भी थक जाऊँ मन से मैं गोद तुम्हारी बने बिछावन, ख़ुद सोती शूल - शैया पर मुझको देती फूलों का उपवन।
चोट कभी जो लग जाती मुझको
आँसू छलके तेरे नयनों से,
मरहम बनता स्पर्श तुम्हारा
हँस देता मैं तेरे छूने से।
खेल - खेल में मैं छुप जाऊँ
और तेरी नज़रें खोज न पाए,
व्याकुल हो कर मुझे ढूंढती
लल्ला - लल्ला कह मुझे बुलाए।
चुपके - चुपके मैं आता पीछे से
तू रहती अँखियाँ मीचे,
इससे पहले कि तू आँखे खोले
मैं छुप जाता तेरी आँचल के नीचे।
इसी तरह हम खेला करते जैसे आंख - मिचौली, शैशव की इस मृदु क्रीड़ा से भर जाती तेरी झोली।
By Chandra Kant Mishra

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