मौन
By Himanshu Badoni
यह शांति का पर्याय बना, मनुष्य के चित्त की स्थिरता ही मौन है।
इसके बिना अस्तित्व अज्ञात, मानवता भी पूछे; मनुज तू कौन है?
एकांकी होने का समर्थन करे, पर एकांत की टीस न सह पाता है।
मौन स्वयं सांकेतिक होते हुए भी, हमसे बहुत कुछ कह जाता है।
समाज के घोर लांछनों को सहा, ऐसी थी सीता के मौन की कथा।
धर्मसंकट में फँसके कुछ न कहा, यह है बेचारी मांडवी की व्यथा।
कभी तीक्ष्ण शूल, कभी ज्वलंत फूल, ऐसे रूपों में विरह आता है।
मौन स्वयं सांकेतिक होते हुए भी, हमसे बहुत कुछ कह जाता है।
बचपन से यौवन, यौवन से प्रौढ़ व प्रौढ़ से वृद्ध, यही तो सफ़र है।
हमारी काया तो पुष्प-सी सुगंधित, पर देह एक भटकता भ्रमर है।
यादों को ज़हन में रोकना चाहा, पर वक्त रेत बनकर बह जाता है।
मौन स्वयं सांकेतिक होते हुए भी, हमसे बहुत कुछ कह जाता है।
कभी ये स्थिरता धारण कर लेती है, साक्षात गौतम बुद्ध का भेष।
कभी शब्दों की माला जो बने, तब सुनाती है महावीर के उपदेश।
मौन परमार्थ के मार्ग से होकर, सौम्य-साधुवाद का स्नेह पाता है।
मौन स्वयं सांकेतिक होते हुए भी, हमसे बहुत कुछ कह जाता है।
जिसका एक भी क्षण न धूमिल हो, जीवन ऐसा सुन्दर नज़ारा है।
ऐसा ही शाश्वत स्वप्न देखते हुए, यहाँ सभी ने ये जीवन गुज़ारा है।
जटिल संकट में फंसा है फिर भी, ये हर संभव सुलह करवाता है।
मौन स्वयं सांकेतिक होते हुए भी, हमसे बहुत कुछ कह जाता है।
युक्ति, मुक्ति और शक्ति के लिए, मौन ही एक सशक्त हथियार है।
यह मित्र, चित्र व चरित्र बदले, इस गुण की अनुभूति अपरंपार है।
हर क्लेश का अन्त करते हुए, बिखरे रिश्तों को भी जोड़ जाता है।
मौन स्वयं सांकेतिक होते हुए भी, हमसे बहुत कुछ कह जाता है।
कोई जीवन शुरुआत के दिनों से, कमाल और बेमिसाल रहता है।
किसी को कुछ न मिलने पाने का, असंतोष और मलाल रहता है।
मन तो स्याही उढ़ेले फिर भी, अंत में कोरा पन्ना शेष रह जाता है।
मौन स्वयं सांकेतिक होते हुए भी, हमसे बहुत कुछ कह जाता है।
By Himanshu Badoni

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