भूख
Updated: Jul 18, 2025
By Kshitij Kawatra

उन लोगों की मुझको फ़ितरत समझ नहीं आती
जिन्हें एक भूखे पेट की दहशत समझ नहीं आती
किसी ख़ुदा से अब हम उम्मीद भी क्या रखें
होता कैसे कोई इतना बद-क़िस्मत समझ नहीं आती
जिसके बच्चे भूखे हो बस वहीं जानता है
किसी और को दिल में उठती जो वहशत समझ नहीं आती
दुनिया का तो काम है ग़रीबों का मज़ाक़ उड़ाना
स्मारक के नाम पर ६०० फ़ीट की ‘इमारत समझ नहीं आती
अगर निय्यत के ये भी कच्चे हैं, तो इन
पंडित, मौलवी, पादरी की ज़रूरत समझ नहीं आती
ग़ालिबन आज जो मेरा है कल किसी और का होगा
क्यों मुझे वक़्त की ये आदत समझ नहीं आती
हैरत होती है इन साधू, फ़क़ीरों पर मुझे
मुफ़्लिसी में भी सुकूँ, ये हिम्मत समझ नहीं आती
किसी और की बद-हाली पर कौन रोता है यहाँ
‘क्षितिज' तुम्हें ये लिखने की क्यों फ़ुर्सत समझ नहीं आती
By Kshitij Kawatra

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