फना..
By Divya Viswanath
एक बार,खुदी को मिटाके
होना चाहु फना
पानी में घुलके ,धुल में मिलके आग में जलके
होना चाहु फना
जिधर किया रुख, घाव उधर मिलता गया,
जब चंदा ही जलाये तो कैसे मिलता चाव बोलो भला
जो ज़िन्दगी दे वही करदे ख़त्म तो होगा क्या?
पार लगनेवाला साहिल ही कश्ती डुबोये फिर कहु में क्या…
शोर हैं हर और हैं लेकिन सन्नाटा हैं इतना क्यों?
हाँ भीड़ भी हैं उसका चीर भी लेकिन दिल का हर कोना सूना क्यों?
बेचैनियोंकी खायी में दिल गिरता ही जारहा हैं ऐसा क्यों?
बस होना चाहु फना..
सुखरहा हैं लहूं कतरा कतरा.
बिखररहा हैं वजूद हर लम्हा लम्हा
कही इन वादियोंमें अब सुकूनसे सोयेगा आवाज़ ये
कदम इस और बढ़ाओगे कभी तोह वह सुनाईदे.
अब ख़तम हैं यह नज़्म,न बाकी हैं कोई सदा.
इस बात का इत्मीनान हैं के न होगा दर्द
न चाहिए दवा,
मेरे इस खालीपन का इलज़ाम ये खुदा क्या तुझपे दालु या थोपु खुदपे
रेहनेभीदो, तुम बस औरोंकी तरह हससकते हो मुझपे.
अब बस होना चाहु फना..
By Divya Viswanath

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