तुम
By Manas Saxena
सुना है कि तुम पढ़ती बहुत हो
शोर मौहल्ले में भी पसंद नहीं
तुम्हारे मौहल्ले के बच्चे लड़वा दिये हमने
चाहें तुम्हारे दीदार के इंतज़ार में ही सही |
भले नाराज़ी से ही सही
बच्चों को हड़काने से ही सही
भले ही हमसे मिलने न सही,
बेहरहाल बहार आओ तो सही
जिस रोज़ से तुम्हारी गली में तुमसे
अपने इश्क का बखान करते फिरते है
सुना है तुम्हारे पड़ोसी भी
खिड़की से झाँकने लगते है |
और वो कहती है कि
मेरी गली से यूँ रोज न निकला करो
लोग मुझे तुम्हारे नाम से चिढ़ाते हैं,
मगर मता ए जान सिर्फ तुम ही नहीं
अपने जानने वालों में हम भी
तुम्हारे नाम से छेड़े जाते हैं ||
By Manas Saxena

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