चाह
By Akansha Ashok
मैं यह ग़ज़ल लिखना नहीं चाहती,
मैं अब बस किसी शायर की ग़ज़ल में उतरना चाहती हूँ।
उस स्याही से बयान की हुई एक चित्र कला के रूबरू जैसे,
मैं बस एक लफ़्ज़ बनना चाहती हूँ।
उन किताबों के पन्नों पर लिखी नाकाम इश्क़ पर वो ग़ज़ल बनना चाहती हूँ।
साथ कश्ती डूबी है इश्क़ में,
मैं लैला मजनूं सा प्यार नहीं,
मैं बस उनकी ग़ज़लों का ज़रूरी पात्र बनना चाहती हूँ।
मैं मुकम्मल इश्क़ नहीं, बस एक नाकाम इश्क़ चाहती हूँ,
चाहतो कि इस चाह में, कुछ एकाध चाहत अधूरी रखना चाहती हूँ!
By Akansha Ashok

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