काई
By Sushant Saurabh
अब दूब नहीं खिलते,
मिट्टी पर
काई जम गई है।
पुराने रिश्तों को अगर,
छोर दिया जाता,
लापरवाह।
बिना देखरेख के।
उनमें भी काई जम जाती है।
पुराने अनदेखे घरों जैसे।
कुछ पुराने बर्तन,
जो रखे हुए है, बहुत दिनों से
वो भी नहीं बचते।
सीलन लगे दीवार,
नमी में भींगते कालीन,
सबको खा जाती है ये काई।
परंतु ये काई,
स्थाई नहीं होती।
हट जाती है,
थोड़ा रगड़ने से।
नमी के कारण,
जो परत पड़ी थी,
जल ही उसका उद्धार करती है।
वैसे ही ये पुराने रिश्ते,
फिर से नए हो जाते।
हँसने लगते है, दोबारा।
बस काई को हटाना परता है,
बार - बार।
By Sushant Saurabh

Comments