कवि
By Yash Abhrankash Panda
यह कविता कवि और हर इंसान की भावना को दर्शाता है जब वो किसी खुशी और उल्लास भरी महफिल से अपनी अकेलेपन भरी निजी जिंदगी में घर वापसी कर रहा होता है।
क्या चाहे मन?
कभी चाहे संगत तो कभी मांगे धन।
कवि सोचे "काश रोक पाता मैं यह पल।"
रवि है कि माने ना और दिन जाता ढल। क्या चाहे मन?
"चल, राह अभी काफ़ी है बाक़ी। तू चल।"
कवि कहे खुद से और जाता संभल।
चप्पल भी टूट चुकी चलते तो अब
कमीज़ बनी पट्टी नसीब न मरहम।
कितनी बातें, कितनी लाशें,
कितनी कल्पनाओं से मुलाकातें,
कवि ने सुख में देखे खेलते, घुटने देखे टेकते,
वक्त बीते या ना बीते, क्या न देखें आंखें?
सब्र करता थक चुका, वो सिलसिलों से डर गया है।
भंवरा बन डोलता किसी फूल पे वो मर गया है।
"क्या चाहे मन?" इसका उत्तर मिलना बाकी है तो
बिन छांव के कवि खोज में ज़रा सा जल गया है।
बस चल रहा है।
By Yash Abhrankash Panda

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