कभी
By Ananth
लौ है मेरी आज धीमी
सूर्य था मैं भी कभी
चुप हमेशा था नहीं
आवाज़ थी मुझमें कभी
जिस बुलंदी की सदाएँ
तज चुके बाक़ी सभी
उस अकेले आसमाँ में
ध्वज मेरा ही था कभी
धूल है जिस रास्ते पर
वक़्त भी जाता नहीं
उस सड़क पर, ख़ुशनज़र,
मंदिर भी था मेरा कभी
खो चुके शायद वो मेरे
दिन उजालों के कहीं
क्या बताऊँ रात को अब
सूर्य था मैं ही कभी।
By Ananth

Comments