Maa
Updated: Aug 28, 2025
By Prachi Raghuwanshi
सब कहते हैं तुम कहीं नहीं गयी,
मान लिया।
पर आख़िरी मुलाक़ात की हक़दार तो थी ना मैं?
सब कहते हैं तुम सुन सकती हो मुझे,
मान लिया।
पर क्या आख़िरी कहा सुनि की हक़दार भी नहीं थी मैं?
तुम मुझे देख रही हो,
मान लिया।
पर क्या मेरा तुमको आंख भरके देखने का हक़ नहीं था?
तुमको महसूस कर रही हूं,
पर आख़िरी अहसास का हक़ तो था न?
मानती हूं जहां हो तुम
वहां न कोई दर्द है, न कोई दुःख है।
पर आख़िरी दिलासे का तो हक़ था न?
न तुम लौटोगी इस दुनिया में कभी,
न तुम मिलोगी इस दुनिया में किसी से।
पर एक आख़िरी बार मिलना था न।
जी भर के देख लेती,
जी भर के बातें कर लेती,
जी भर तुम्हें छू लेती।
उस आख़िरी मुलाक़ात के लिए
जिसकी हक़दार थी मैं,
उन आख़िरी पलों के लिए
जिनके लिए जी रही थी मैं।
आसान नहीं तुम्हारे बिना रहना
तुम्हारे बिना जीना।
तुम किस्सा नहीं,
मेरी पूरी कहानी थी।
तुम हिस्सा नहीं,
मेरी पूरी ज़िन्दगी थी।
By Prachi Raghuwanshi

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