सच
By Sakshi Singh
सागर की गहराई तक कोई जाना नहीं चाहता,
झूठ के पर्दों को कोई उठाना नही चाहता,
बेच कर ईमान अपना बैठ गए अब लोग,
सच की बुनियाद पर मकान कोई बनाना नहीं चाहता।
छीन कर गुलिस्तान दूसरे की मेहनत का, इतराते हैं लोग,
तारीफों के हकदार को खिताब उसका कोई दिलवाना नही चाहता।
बनावटी अपनेपन को देख खिल जाते हैं लोग,
सच का नीम कोई चखना नहीं चाहता।
झूठी मुस्कुराहटों पर पिघल जाते हैं लोग,
चेहरे पर लगा नकाब कोई हटाना नही चाहता।
मेहनत भरी ऊंची उड़ान से मुंह फेर लेते हैं लोग,
हौंसलो के पंख कोई फैलाना नही चाहता।
By Sakshi Singh

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