घर
By Aishwarya Samir Saraf
क्यों घर कभी घर नहीं लगता,
क्यों ससुराल कभी मायका नहीं हो सकता?
क्यों अपनी उड़ान के हम खुद कप्तान नहीं हो सकते?
क्यों अपनी पहचान के हम मालिक नहीं हो सकते?
ये सवाल मुझे अक्सर परेशान करते हैं,
इनके जवाब बताओ — क्यों हम उन्हें ढूंढ नहीं सकते?
हमारी आज़ादी हमारा अधिकार है,
तो फिर क्यों ये अधिकार पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हो सकते?
क्यों नई सोच और नई पहचान बनाने का जज़्बा
हो जाता है कम,
जब बुज़ुर्गों की रूढ़िवादी सोच कर लेती है दिमाग़ पर क़ब्ज़ा?
They say adjustment is the key to happiness,
But do you know how much it causes us stress?
I am a woman, I want to bring change,
But their opinions make everything feel so strange.
साथ तो देते हैं, मगर अधूरा,
भूलने लगी हूँ वो वादा, जो खुद से किया था पूरा।
पापा कहते थे — “बड़ा नाम करेगी,”
पर क्या वो आधुनिक सोच से बदलाव ला सकेगी?
बनना चाहती हूँ मैं एक अच्छी बेटी, बीवी, बहू,
पर अपने ख़्वाबों से समझौता कैसे मैं सहूँ?
बदलना तो है समाज और घर,
बदलना तो है समाज और घर,
तभी तो पापा की परी के खुल सकेंगे पर —
पापा की परी के खुल सकेंगे पर!
By Aishwarya Samir Saraf

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