1857 मे यदि सभी आवाज एक होती
Updated: Jul 24, 2025
By Kushagra Singh

उठो न्याय के लिए लाडो नर
बेड़िया पिघलाकर तलवार बना दो
ताप तचादो शीत लहर को
अम्बर पर तोपे गर्जा दो
बर्मिंघम तक डोल उठेगा
ऐसी वाणी मे हुंकार मचा दो
भूखंड धरा पर भार अटल है
त्याग तेज तप बल से जडा
भारत का अभिमान अटल है भारत की सन्तान अटल है ।
अजस्र सा अटूट सा अमर अजय प्रहार करेंगे
अंतः की ज्वाला का पुनः पुनः विस्तार करेंगे
अनल लगाकर हृदय जलाकर बेहद वा बेहिसाब करेंगे
प्रत्येक श्वास प्रत्येक बार मे विद्रोह ग्रसित श्रृंगार करेंगे।
उठो न्याय के लिए लडो नर
उठ चलो नर मुंडो के सौदागर
चल चलो क्रोध के यथावत
गंभीर समर के वज्र उठो
उठ चलो इंद्र के ऐरावत
बनजाओ भवानी शास्त्र उठा लो
लेलो करवाल संहार मचा दो
रक्षक बन रक्षण कर रक्षयमाण करना है लोकतंत्र का
सब जन को साथ लिए सकल निर्माण करना है नये मंत्र का।
बज रहे ढोल बज रहे नगाड़े
गूँज पडी है रण भेरी बज गए महा समर के बाजे
एक ओर से महा अटल महा निद्रा पुकार रही है
दूजी ओर पीड़ा मे पडी माता दो टूक निहार रहीं है
मझधार खड़ा हूँ महा समर मे
हे नीलकंठ हे त्रिपुरेष हे चंद्रचूड़ हे कैलाशी
हे काल विजेता महा प्रलय मृत्युंजय हे महा रुद्र हे महा अविनाशी
मुझे एक दिवस का अमर बना दो
इस महा समर मे अजर बना दो
माता के समक्ष अटूट सी ढाल बनु मैं
दुष्टों के समक्ष परशुराम सा विक्रल बनु मैं
हे बैकुंठ नरेश हे अजिर बिहारी
हे केशव माधव हे सुदर्शन धारी
मेरी प्रत्येक श्वास मे बल देदो
मेरी मृत्यु को भी छल देदो ।
चल चलो संगी संग मेरे
आज अजर अमर लडता हूँ
ले चलो रण के मध्य मुझे अब विजय मंत्र पढ़ता हूँ।
चाहे पथ मे ताज अड़ा हो
चाहे समक्ष रावन राज खड़ा हो
एक कदम ना पीछे हटना
आठों पहर तक लड़ते जाना
दसों दिशा मे मर मिटना
वे एक लाख तुम एक अमर हो
हे रामचंद्र के बाण उठो
वे खर-दूषण तुम काल अजर हो
लेकर शूल बढ़ो आगे
अब विजय मंत्र को पढ़ना होगा
प्रजा तंत्र को उठना होगा
राजन को भी मिटना होगा
गरज पड़ेंगी रक्त की धारे
और गरज पड़ेंगी भू पर तलवारे
बरछी से कटार मिलाकर अंगारों से अंगार मिलाकर
बढ़ चलेंगे अन्याय का राज गिराने
मस्तक पर चंदन व राख लगाकर
मस्तक पर चंदन व राख लगाकर।
By Kushagra Singh

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