।हाल देखा है।
By Harsh Vardhan Poddar
यह जो शोर में घूमते सन्नाटे हैं, इनके दर्द को हंसते देखा है।
वह जो गली नुक्कड़ों से बंधे हैं, उन्हें सड़कों पर आजादी ढूंढते देखा है।
वोह जो उल्टी खाट से पढ़े हैं, उन्हें चैन से सोते देखा है।
बेखयाली को बेमतलब, आंसू बहाते देखा है।
नींद के आगोश को, करवट लेते देखा है।
बेहोशी को भूख के साथ बैठे बात करते देखा है।
हवा को जैसे आग से, भीख मांगते देखा है।
समय को रैत की तरह बहते देखा है।
माया की धेरि को दो पल में बिखरते देखा है।
उस गुप्प अंधेरी रात में चांद को रोते देखा है।
आज खुद को यूं खर्च होते देखा है।
वो जिन्होंने इनमें से कुछ भी नही देखा, कहते है हमने दुनिया का हाल देखा है।
By Harsh Vardhan Poddar

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