फ़ुरसत
By Anilkumar
मैं सोचता हूँ कोई दिन
फुरसत मिले तो नदी किनारे घूम आऊँगा
भारी दोपहरी आम के टिकोले तोडूंगा
और घने पेड़ के छाँह तले सुस्ताऊँगा
मैं सोचता हूँ कभी फुरसत मिले तो
नन्हीं गोरैया के लिये दाना पानी रख आऊंगा
गिलहरी को अपने हाथों से खिलाऊँगा
मैं सोचता हूँ कोई दिन फ़ुरसत मिले तो
घर में तुलसी के पौधे लगाऊंगा
शाम में मिट्टी के दिये
जलाऊंगा
मैं सोचता हूँ
कभी पैसे हों इकठ्ठे ज्यादा
तो किसी भूखे को खाना खिलाऊँगा
किसी गरीब बच्चे के लिये खिलौने ले आऊँगा
मैं सोचता हूँ कोई दिन
फ़ुरसत मिले तो सांताक्लॉज
बन जाऊंगा।
By Anilkumar

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