ज़िद्दी ज़िन्दगी
By Shubham Kabra
जश्न की इस रात के लिए, बेचैनी की कितनी रातें बीती है,
क्या ये हमेशा याद रख पाउँगा ?
जिंदगी की पटरी पर जो उछलते कूदते स्मभाला हूँ,
क्या खुशियों की चकाचोंध में फिर से डगमगा जाऊंगा ?
मासूमियत समझकर जो बेवकूफियां की थी मैंने,
उनसे बड़ा रास्ता कोई अबतक दिखा नहीं पाया |
फिर भी अकेला छूट जाने से डर जाता हूँ,
क्या होगा अगले मोढ़ पे, ये सोचकर बिखर जाता हूँ |
इस डर ने चलने का सलीखा तो सीखा दिया,
पर दबंगई की उस दौड़ का मज़ा अलग था,
मन गिर जाने से चोट गहरी लगती थी,
पर वो धड़कनो की तेज़ी, कही और कहा मिलती थी |
लोग कहते है अब और कोई गलती मत करना,
तो क्या गिर जाने के डर से, दौड़ना फिर से छोड़ दूँ ?
गिरने का खतरा तो धीरे धीरे चलकर भी नहीं जाएगा,
अपनी फितरत पर कायम रहकर, कम से कम रूह को चैन तो आएगा |
जितने अखाड़े ज्यादा लडूंगा, फतेह भी उतनी ज्यादा करूँगा,
पुरानी गलतिया दोबारा नहीं करूँगा, पर बेवजह कभी नहीं डरूंगा |
लोग कहते हैं, अभी तक इसमें इंसानियत नहीं आयी है,
एक बात बताओ, भला शेर की चाल, कभी किसी गधे को समझ आयी हैं ?
By Shubham Kabra

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