ज़िंदगी की जंग
By Santosh Kumar Koli
हे ज़िंदगी,
अभी गिला मत कर |
अभी मंचन मुहूर्त है,
शिला इला मत कर |
कंटक गह्वर बाट,
झाँखर झाँई,तक्षक |
फासिद,फिरकेबंदी,
रमूज रभस का भक्षक |
पटपर राह चूहेदान कई,
बंद लक्ष्य का पक्षक |
खुदमुख़्तार,खुदरंग रमक़ तक,
खुद का रक्षक |
इनसे मिलकर भी,
मिला मत कर |
अभी मंचन मुहूर्त है,
शिला इला मत कर |
रुलाएगी दुनिया,
पर रोना नहीं है |
नायक है मनुज,
खिलोना नहीं है |
वही होगा जो करोगे,
इतर कुछ होना नहीं है |
मंज़िल चिपकी है क़दमों से,
सोना नहीं है |
राही राह पकड़,
अंदर तक हिला मत कर |
अभी मंचन मुहूर्त है,
शिला इला मत कर |
गिरोगे पर गिरना नहीं है,
झाड़ धूल चल देना है |
पथ की नकटी कठिनाइयों को,
चुटकी से मसल देना है |
देख रही है तुझे पीढ़ियाँ,
सुदृढ़ नसल देना है |
बिछुड़ोगे,पर बिछुड़ना नहीं है,
रिश्तों को नयी मिसल देना है |
शिथिल सोच का,
काफ़िला मत कर |
अभी मंचन मुहूर्त है,
शिला इला मत कर |
हे ज़िंदगी,
अभी गिला मत कर |
अभी मंचन मुहूर्त है,
शिला इला मत कर |
By Santosh Kumar Koli

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