होस्टल के दिन
By Monika Sha
बैठी हूँ अकेले
कुछ बातें याद आ रही हैं
उन बातों में भी
होस्टल की रातें याद आ रही हैं।
क्या कुछ नहीं सोचा था
होस्टल के जीवन के बारे में
कैसे रहूँगी अकेले वहाँ
बिना परिवार के सहारे मैं।
डरती थी मैं होस्टल के जीवन से
क्या कुछ नहीं सुना था मैंने
लड़ना होगा मुझको वहाँ
अपने न्याय और हक के लिए।
यह सुन मैं डर सी गई थी
ना जाने कैसा होगा मेरा जीवन
लड़ना भी ना आता था मुझको
कैसे लड़ती मैं अपने हक के लिए।
रूममेट की जो छवि दी थी औरों ने
उससे मैं सहम सी गई थी
होस्टल ना जाना पड़े मुझे
इसके लिए दुआ करने लगी थी।
पर जब पहली बार मिली थी
मेरी आंखे उसी पर रुक गई
वह कुछ दूसरी भाषा में बोल रही थी
मै उसी को देखती रह गई ।
हमारा परिचय हुआ उस दिन
बस इतनी ही बात हुई थी
सारे सामान को कमरे मे सजाकर
मै रोती हुई सोने चली गई थी।
कुछ दिनों ऐसे ही रोते हुए बीते दिन
पर धीरे-धीरे बदला वक्त
मुझे भाने लगे होस्टल के दिन
और भी भाने लगा मुझे मेरा बदलता वक्त।
जो छवि गढ़ी थी लोगों ने
वह एक एक करके टूटती चली गई
धीरे- धीरे मेरा अपने रूमी के साथ
दोस्ती मज़बूत होती चली गई।
बहुत से दोस्त बने मेरे
जिसके साथ मैं खुश रहती थी
खाने के वक्त मिलने पर
मैं ढेर सारी मज़ाक भी किया करती थी ।
कुछ महीनों का ही था
मेरा होस्टल का जीवन
पूरी तरह से जी भी न पाई थी
मै अपनी हॉस्टल का जीवन।
पर अब अपने घर में बैठे
उन्हीं दिनों को याद करती हूँ
और यही सोचती हूंँ कि
हांँ यही था मेरा पहला होस्टल का जीवन।
By Monika Sha

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