हैरान
By Inder Raheja
इस दुनिया में एक सुर्ख सा निशान हूं, किसी ठेस पे खरोच सा या किसी अरमान का उबाल हूं, वजूद खोज रहा हूं मैं किसी सफर पे सुनसान हूं।
रात का अंधेरा और मैं खुद को महसूस हूं, छू रहा हूं खुद को कहके मै सबसे समीप हूं, इन्द्रियों से दूर शांत और बेकार हूं।
समय की गांठ पे कसा हुआ नाभ हूं, रुक कर मेरी उम्र का अभी नाप लूं तो लगता है तजुर्बों का इम्तेहान हूं।
मन से चल रहा विवाद हूं, अभी मासूम गोद में प्रहलाद हूं, निर्धन, हार जीत से परे कोई प्रमाद हूं।
विश्वास की दीवार पर दरार हूं, नीव पर निर्भर हर प्रकार हूं , उदेश्यहीन उठी चीख की बुझती हुई पुकार हूं।
हूं मैं आसमां पे ना धरा पे विश्राम हूं, ना बह रहा हूं ना ठहरा किसी स्थान हूं, वजूद खोज रहा हूं मैं, लोटा हूं, खामोश हूं, हैरान हूं।l
By Inder Raheja

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