हे बुद्ध
By Rashmi Prabha
कौन अंतर्द्वद्व की बारीकियों में नहीं उलझता ?
किसके आगे अनुत्तरित स्थिति नहीं है ?
लेकिन जिम्मेदारियों के आगे
कई अनसुलझी बातों को ढोते हुए
मनुष्य मृत्यु पाता है
महाभिनिष्क्रमण !!!
- वह अपने मन के घने जंगल में ही करता है !
तब के युग में इसे युवा मन का अकेलापन मानकर
पिता शुद्धोधन ने विवाह कर देने का फैसला लिया
और एक स्त्री को क्षत्राणी मानते हुए
एक व्यक्ति के भूलभुलैये को संभालने के लिए
उसके साथ बांध दिया !
जब मान्य सत्य मन की उर्जा पर हावी हो जाए,
तब अपनों का साथ,
उनकी विशेष देखभाल आवश्यक है
न कि अपनी जिम्मेदारी किसी के सपनों के आगे रख देना !
क्या यशोधरा के चेहरे ने
कभी उद्वेलित नहीं किया ?
जीवन की संध्या में
वह भी एकांत में क्षमा मांग लेने से
मन क्षमा कर देता है क्या ?
वैसे क्षमा तो बाहरी अनुमान है
एकांत में कौन सी बात हुई ?
राहुल वहां था या नहीं ?
उसकी क्या प्रतिक्रिया थी !
जो यशोधरा ने उसे साथ भेज दिया ?
शायद उसी घुट्टी का असर होगा,
जो पहले निवाले के साथ स्त्री को मिलता रहा है ...!!!
खैर !
मन की उठापटक का निदान महाभिनिष्क्रमण
- एक हार ही है - मृत्यु से भी अधिक दर्दनाक
जो कि निःसंदेह यशोधरा ने नहीं किया !
उसने तो राहुल की करवटों में,
उसकी समुचित शिक्षा में
एक अद्भुत ज्ञान दिया
और निर्वाण को प्राप्त किया ...
यशोधरा की मूर्ति कहीं स्थापित है भी या नहीं
पर कवि मैथिलीशरण गुप्त की रचना में वह अमर हैं
"मानिनी मान तजो" की कल्पना से ख़ुद को जोड़ते हुए
मेरे मन ने हमेशा कहा है,
यशोधरा शरणम् गच्छामि...
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By Rashmi Prabha

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