हे नाथ! हमारा संबंध
Updated: Jun 1, 2023
By Manish Agrawal
हे नाथ! हमारा संबंध,कितना है ये विचित्र |
कहीं कोई मेल नहीं, विपरीत हैं हमारे चरित्र ||
तू है अनंत, मैं हूं सीमित।
तू स्वतंत्र, मैं आच्छादित।।
मैं नाशवान, तू है अविनाशी ।
मैं क्षणभंगुर, तू सबका साक्षी ।।
कोई समानता नहीं मिली, मैंने किया अथक प्रयास ।
जितना अधिक किया चिंतन, उतनी ही छूटी मेरी आस ।।
मैं मूढमती, मुझमे है अज्ञान ।
तू सर्वश्रेष्ठ, तू बुद्धिमान ।।
मैं कामातुर, मैं हूं दूषित ।
तू मदनांतक, सभी गुणों से भूषित ।।
अपनी इस तुलना से, मेरे हृदय में छाया है संताप ।
कैसे आऊंगा तुम्हारे सम्मुख, कैसे छिपाऊंगा अपने पाप ।।
पुनः किया मैंने मंथन ।
और अधिक किया चिंतन ।।
तब आशा का फूटा अंकुर ।
बदल गए मेरे फिर से सुर ।।
पूर्ण है तू तो मैं अंश हूं तेरा, स्मृत हो गया ये विचार ।
जब मैं तुझसे पृथक् नहीं, तो ये तुलना है निराधार ।।
मिट गया हृदय का संताप ।
निश्चित है अपना मिलाप ।।
मुझे नहीं है कुछ भी पाना ।
मात्र अपनी 'मैं' को है खोना ।।
हे नाथ! हमारा संबंध,कितना है ये मधुर |
कहीं कोई भेद नहीं, स्नेह है कितना प्रचुर ||
By Manish Agrawal

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