हू मैं यही या मैं नहीं
By Kush Baghla
जो दिलो दिमाग़ से हो परे, ऐसी कशमकश है ये ज़िंदगी
एक सवालो का दरिया है, ना मोड़ ना कोई किनारा है
है शक ये खुद पे, या गुस्ताख़ी आईने की,
हर पल ये पूछता हू खुद से, हू मैं यही या मैं नही
बड़ी अनोखी इस दिल की दासता, की खुद पर काबू पाना इसकी फ़ितरत मे नही
झूट बोलना तो लगे आसान, पर ना हो सके कभी सच बयान
दिल के एक कोने मे, दफ़्न है कितने जज़्बात,
मानो टूट गई वो नब्ज़ भी, जोड़ा था जिसने दिल को ज़ुबाँ क साथ
चंचल मिज़ाज़ सा दिल का अंदाज़, धड़कन पे मेरा ज़ोर नही
हर पल ये पूछता हू खुद से, हू मैं यही या मैं नही
लुभाती है सोच की गहराइयाँ, सोचता हू इनमे डूबा रहू
माना कमिया बहुत सी मुझमे, हू लगता खुद को अधूरा
पर कम्भक्त ये दिल, लालच से भरा, करता है गुज़ारिश
जो दुनिया है सपनो की, बस उसमे तो पूरा रहू
अजब है सारा, इस दुनिया का नज़ारा
की खुली है आँखे, पर होश गुम है
गर झपकी जो पलखे, तो सोच गुम है
कुछ सच है या सब छलावा, अब ज़हन मे रहता सवाल यही
हर पल ये पूछता हू खुस से, हू मैं यही या मैं नही
बहरूपिया ये जिस्म मेरा, लेता करवट हर पल हर घड़ी
कभी खुशी से मुस्कुराए, कभी गम मे पिघल जाए
खुशनुमा अपनो के साथ, थाम के रिश्तो का हाथ
अगले ही पल फिर खुद की खातिर, अपनो को क्या खुद को भी भूल जाए
देखता हू आईने मे जब भी, हू लगता मुश्किल मे बड़ी
है अक्स ये मेरा, या रात की काली परछाई है खड़ी
समझाता हू खुद को, मनाता हू खुद को
की आएगा वो दिन, सब सब कुछ भुला के, हर शक को हरा के
करूँगा बस जो मॅन की कही
हर पल ये कहूँगा सबसे, था मैं यही हू मैं यही
By Kush Baghla

Comments