हिन्दी
By Jyoti Singh
बड़ा विचित्र समारोह है,
कई भाषाएं आई हैं
सब विख्यात,
सब प्रसिद्ध,
एक दूसरे की जानकार
इस हंसी - ठिठोली के बीच में ,
हिंदी बेचारी अकेली खड़ी है
क्या बोले , और क्या ना बोले
बस इसी सोच में पड़ी है
स्पेनिश, रूसी,अंग्रेज़ी, तुर्की
सबने मिलकर,
यह महफ़िल ख़ूब सजाई है
पर डरी सहमी,अब बोलने की
हिंदी की बारी आई है
सबका अभिवादन कर,
लड़खड़ाते हुए,
वह हीन-सी हिंदी
थोड़ी हिम्मत करती है
और धीरे - धीरे मंच पर,
अब बोलना शुरू करती है
आप सभी को बोलने वाले,
मेरे ही देश के लोग,
भारतवासी,
जब थक जाते हैं आपसे,
तो उस नुक्कड़ की चाय में ,
उन्हें मैं मिलती हूं ||
पूरा दिन काम करके,
जब शाम को घर वापस आते हैं
तो उस चारपाई के आराम में,
उन्हें मैं मिलती हूं ||
कभी रिक्शों में मिलती हूं,
कभी गलियों में,
कभी त्योहारों में मिलती हूं,
कभी चौराहों में ||
आप सब की तरह,
मैं बड़े होटलों में नहीं मिलती,
ना बड़ी गाड़ियों में,
ना हवेलियों में,
ना समारोहों में
इन सबसे मेरा कोई नाता नहीं है,
क्योंकि मुझे कोई बुलाता नहीं है
मैं अपने ही देश में,
अपने ही लोगों से बोली नहीं जाती
मैं बहुत सरल हूं,
बहुत साधारण,
इतनी,
कि शायद उनसे मेल ही नहीं खाती
उनका स्तर,
उनका पहनावा,
उनका व्यक्तित्व,
कैसे धुंधला पड़ जाता है, हिंदी बोलते ही
अरे !!
आप सबको बोलने के लिए भी,
उन्हें मुझसे होकर गुजरना पड़ता है
फिर मेरा बोले जाना,
उन्हें कैसे शर्मिंदा कर सकता है
मैं,
भारत की राष्ट्रभाषा तो हूं,
पर कैसे अभिमान करूं
भारतवासी गर्व करें,
मैं कुछ तो ऐसा काम करूं
काश मुझे भी आपकी तरह,
यह सम्मान मिल पाए,
जब किसी भारतीय को,
मुझे बोलने में,
मुझे लिखने में,
कहीं भी,
कभी भी शर्म ना आए
By Jyoti Singh

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