हिज्र की रातों में ये कैसी लाचारी है
By Umar Allahabadi
हिज्र की रातों में ये कैसी लाचारी है,
दिल की धड़कनें भी सीने पे भारी हैं,
क़त्ल हो चुका हूं, सांसें चल रही हैं,
मेरे ज़िंदा होने की तफ्तीश जारी है,
आंखों में खुश्क समंदर, चेहरा बेनूर सा,
इश्क़ की गमों से ये कैसी यारी है,
वो ज़िन्दगी जहां मौत हर पल मयस्सर हो,
वो ज़िन्दगी हमने जीकर गुजारी है,
गर मिले आंसू, मिले गम, मिले तन्हाई तो क्या,
कुबूल है दिल से, ये मोहब्बत हमारी है,
रहा ना उमर खुद में यूं तेरा जो हुआ,
वजूद के हर हिस्से में ये रूह तुम्हारी है।
By Umar Allahabadi

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