हाशिया
By Shashwat Shukla
हाशिए पर हूं मैं, या शायद हम सब
मेरी तो बस कलम रुक गई है
स्याही ने अब कलम का एक गर्म कोना सा पकड़ लिया है
हाशिए पर है वह भी
कागज़ की सिलाई मे उतर कर ठंड से मरने के डर से वह भी सुरक्षा की खोज मे है
दलदल जैसा भी हो, बगल के रेगिस्तान से तो गीला ही होता है
ज़िंदगी की आखरी निशानी लिए अपने मे मस्त रहता है
हाशिए पर है वह दलदल भी आज
एक सूर्योदय हुआ है क्षितिज पर
जिसमे सब कुछ जला कर भस्म करने की ताकत है
भोले सूरज का वरदान पाकर वह सर्वोपरि हो चला है, भस्मासुर बनने को आतुर
दलदल के हाशिए पर हलचल मची है, असहज हैं सभी बाशिंदे
रेगिस्तान की रूह चेतावनी सुनाती है
क्षितिज के हाहिए से बुरी खबर लाती है
वह कहती है
समय है अब भी, थम जाओ
सूर्योदय यह काली रात से कोई बेहतर नहीं
जिस सुनहरे कल की खोज मे सरपट दौड़ चले हो तुम
अपनी अक्ल के हाशिए से लौट जाओ
आंखें काम करना बंद कर चुकी हों तो अपनी चमड़ी का इस्तमाल करो
जो गायब हो चली है आज़ादी की नमी
महसूस नहीं होती क्या तुम्हें?
By Shashwat Shukla

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