हार गया तन-मन
By Jwala
मैं गीत मल्हारी कैसे गाऊँ
खुद डूब रहा मैं किसे बचाऊँ
हाँ कथा व्यथा की किसे सुनाऊं
चीर वक्ष मैं किसे दिखाऊँ
कौन यहाँ अब गरल पिये
मैं चाह के अमृत कहाँ से लाऊँ
आघातों की पीड़ा से
मेरा बिलख रहा यौवन
जब हार गया तन-मन, फिर क्या चेतन
जब टूट गया भीतर से, फिर क्या जीवन
जो नहीं मृत्यु के भय से भी आतंकित हो
मार गया उसको जग में व्यापित क्रंदन
किये जतन लाख पर हाथ नहीं कुछ आया
बन्धन में भी संयम का साथ निभाया
नहीं चाह कभी जीवन मे पाली तर्पण की
मैंने नागों को भी हँस के गले लगाया
पर अब स्वप्न लदे कंधो में रह-रह उठती है टूटन
जब हार गया तन-मन, फिर क्या चेतन
जब टूट गया भीतर से, फिर क्या जीवन
जो नहीं मृत्यु के भय से भी आतंकित हो
मार गया उसको जग में व्यापित क्रंदन
By Jwala

Comments